शनिवार, 26 जुलाई 2008

पं.सीताराम महर्षि

-डॉ. अरुण प्रकाश अवस्थी



यह तो मैं ठीक से नहीं कह सकता कि पूज्य संत कवि पं. सीताराम महर्षि से प्रथम परिचय कब हुआ, किन्तु लगभग 25-30 वर्ष अवष्य हो गए होंगे। हां, उनके पवित्र सनिध्य में जब मैं प्रथम बार आया तो मुझे आश्चर्य अवश्य हुआ। आश्चर्य इसलिए हुआ कि आज के भौतिक द्वन्द्व वाले इस युग में भी ऐसे सन्त कवि हैं।
हमारे हिन्दी व राजस्थानी साहित्य में संत कवियों की एक गौरव मण्डित दीर्ध परम्परा है। कबीर, सूर, तुलसी, मीरा दादू आदि महाकवियों ने काव्य का जो शुद्ध सात्विक एवं कुण्ठारहित स्वरूप सृजित किया, वही आज विश्व साहित्य के गरिमामय हीरक मण्डित सर्वोच्च षिखर पर हमारे साहित्य को प्रतिष्ठित किए हुए है। यह स्वीकार करने में रंचमात्र भी अतिरंजना न हो कि श्रद्धेय कविवर श्री महर्षि जी उसी परम्परा की एक मणि है।
उनके साथ अनेक कवि सम्मेलनों में भाग लेने का मुझे सुअवसर प्राप्त हुआ। डॉ. भगवती प्रसाद चौधरी के साथ राजस्थान दर्शन में उनका सानिध्य लगभग 15 दिनों तक मुझे मिला। दुबारा कुम्भ के समय नासिक त्रैयम्बकेस्वर सिरडी, सोमनाथ, नागेश्वर, द्वारका में भी उनका सानिध्य मुझे मिला। उनसे बड़ी अंतरंगता से बातें हुई। मुझे ऐसा लगा कि उन्हें प्रथम संत मानूं या श्रेष्ठ कवि? वस्तुतः उनके दोनों स्वरूपों को परस्पर एक दूसरे से पृथक करना असम्भव है। वे संतों में आदर्श गृहस्थ संत विदेह हैं और कवियों में अकुण्ठ भावों के वैकुण्ठ। उनकी कविता का मूल स्वर मानवता के उच्च आदर्शों से मण्डित है। उनकी अनेक रचनाएं मैंने स्वयं उनके मुख्य से सुनी। उनके अर्थ गाम्भीर्य को थोड़ी थाह पाने के बाद यही कह सकता हूँ कि उनका अर्थ जानने के लिए इस विशेष का ज्ञान होना चाहिए। गोस्वामी तुलसीदास ने ऐसे ही रस विषेष के निष्णात कवियों के विषय में कहा है-
राम-चरित जे सुनत अधाहीं।
रस विशेष जाना तिन्ह नाहीं।।
उनकी रचनाएं तृप्त न करके एक अद्भुत प्यास जगाती हैं। बार-बार सुनने और उनमें अवगाहन करने की अटूट इच्छा होती हैं। उनकी रचनाओं में कहीं भी व्यक्तिगत कुष्ठा कल्पित आत्म वंचना नहीं है। वे शुद्ध मानवीय प्रेम से आप्लावित हैं और आत्मा को परम तत्व से जोड़ती हैं। स्वान्तः सुखाय की विस्तृत भाव भूमि पर आघृत ये रचनाएं आज सर्वजन सुखाय बन गई हैं। उनके उदस्त मानस-सर में जो काव्य के दिव्य परागरस पूरित अरविन्द खिले हैं वे केवल मानव एवं परम सत्ता के लिए ही अणि के योग्य हैं। उन्हें किसी बाद या शिविर से प्रतिबद्ध करना अज्ञान ही होगा।
उनकी अनेक पुस्तकें प्रकाश में आ चुकी हैं, उनके ही अर्थ सार को लेकर उनपर कुछ लिखने का साहस जुटा सका हूँ। मुझे भली-भाँति स्मरण है कि उनकी एक प्रसिद्ध रचना ‘प्रेम’ पर मैंने गिरीडीह के कवि सम्मेलन में सुनी थी। ‘श्रोताओं की अपार भीड़ थी पर जैसे ही श्री महर्षि जी ने उक्त कविता का पाठ किया अपूर्व सन्नाटा छा गया। लोग ताली बजाना भी भूल गए। सच पूछा जाए तो मैंने आज तक प्रेम पर ऐसी कविता न पढ़ी है और न सुनी ही है। आजकल के रचनाकारों ने प्रेम को उसके उच्च पद से स्खलित कर काम का द्वौवारिक बना दिया हैं। महर्षिजी ने जिस प्रगल्मता से प्रेम की व्याख्या की वह अनुपम है।
उसके पश्चात तो उनसे मेरा हार्दिक सम्बन्ध घनिष्ट से घनिष्टतर होता गया। दो-दो यात्राओं में उनका जो सानिध्य मिला, उससे थोड़ा मेरा संकोच भी न्यून हो गया। वे ऊपर से गम्भीर किन्तु भीतर से एकदम खुले विचारों के लगे। यद्यपि आयु एवं योग्यता में वे मुझसे श्रेष्ठ हैं पर मैं भी उनसे खुल गया। एक प्रकार से उनका मुंह लगा हो गया। हास-परिहास का कोई भी अवसर आता वे चूकते नहीं हैं । मुझे भी हास्य संबंधी चुटकियां सुनाने हेतु यात्रा के मध्य प्रोत्साहित करते रहे। सचमुच ऐसे संत कवि के भीतर एक निश्छल कोमल शिशु विद्यमान हैं।
आज के युग में ऐसे व्यक्तित्व का मिलना असम्भव ही है। घर में रहकर भी विदेह, हम ऐसे चाण्डाल, कवियों की खल मण्डली में रहकर भी संत, अपूर्व विरोधाभास है हम सब प्रिय एवं श्रद्धेय महाकवि पं. सीतारामजी महर्षि। स्वाभिमान एवं आत्म पवित्रता के जीवन्त प्रतीक पर अभिमान का रंचमात्र भी अंश नहीं। एक सफल सिद्ध कवि पर प्रचार की आकांक्षा से कोसों दूर। सचमुच वे एक विरोधाभास हैं। ऐसे संत कवि को समझने के लिए हमें सिन्धु की सीमा हीन गहराई एवं अनन्ताकाश के सीमाहीन विस्तार तथा उनकी पावनता का अनुमान करने के लिए हिम शिखरों के अवाक् शुभ्र सौंदर्य को सामने रखना होता हैं।
ऐसे संत कवि को मेरा शत्-शत् नमन।

2 टिप्‍पणियां:

litoo ने कहा…

pyar ko naman kro hindi ki utkrist racnao me sumar hogi

सुनील गज्जाणी ने कहा…

aadar jog sita ram jee ko saadar pranam ! pehli baar blog pe aane ka soubhgaya prapt hua , oonka sahitya padhne ki ichcha hue , khae.. aadar jog humari aur harare ssahitya blog patrika aakharkalash ki aur se saadar praranm!
saadar